AIMIM के जिम्मे है भाजपा के लिए सांप्रदायिक मुद्दे सेट करना ?

हिंदी बेल्ट में हुए बीते राज्यों के चुनावों में और इस बार हुए बिहार चुनावो में भाजपा के चुनाव प्रचार में बहुत बदलाव आया। जंहा देखा जाए उत्तर प्रदेश और दिल्ली के चुनावो में हिन्दू मुसलमान का बोलबाला था वंही इस बार बिहार चुनाव में भाजपा ने हिन्दू मुसलमान की शुरुआत नहीं की गई। झारखण्ड में कपडे से लोगो को पहचानने की सलाह दी थी वंही दिल्ली का चुनाव तो पूरा का पूरा CAA और सांप्रदायिक मुद्दों पर लड़ा गया। और बीते उत्तर प्रदेश चुनाव में चुनावी प्रचार कब्रिस्तान – शमशान तक पहुंच गया । बड़े बूढ़ो की माने तो ऐसी बातें करना भी अपशकुन माना जाता है।
खैर नियति कहें या कुछ और, पर दुखद है कुछ दिन पहले एक नवनिर्मित शमशान में मुर्दे को जलाने आये लोग खुद राख हो गए। शमशान की कार्यप्रणाली में ऐसी दक्षता पहले कभी न थी। भगवन मृतकों की आत्मा को शान्ति दे।

बहरहाल बिहार चुनाव पर आते हैं। इस बार बिहार चुनाव में भाजपा साम्प्रदायिकता के बीज कम बोये। इसपर लोग सोचेंगे की इसका सबसे बड़ा कारण रहा दिल्ली और झारखण्ड साम्प्रदायिकता के मुद्दे को मिली करारी हार। यद्यपि ये जरूर निष्कर्ष निकाला जा सकता है की दिल्ली- झारखण्ड की हार से भाजपा को समझ में आ गया था की केवल साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर चुनाव नहीं जीता जा सकता। पर एक सच्चाई ये भी है की साम्प्रदायिकता के बिना भाजपा शायद ही कभी कोई चुनाव जीती है। तो ऐसा क्या रहा की भाजपा अपना साम्प्रदायिक वोट बैंक बचा सकी और गैर साम्प्रदायिक वोट बैंक बचा सकी?
इसका जवाब मिलता है ओवैसी में। जंहा भाजपा ने नीतीश जी को आगे किया गया और अपने १५ साल के काम गिनाने की बजाये लालू परिवार के कार्यकाल को दिखाया गया। वंही साम्प्रदायिक वोट बैंक को साधने के लिए ओवैसी को आगे किया। ओवैसी जंहा भाजपा के लिए साम्प्रदायिक मुद्दे पटल पर लाया वंही भाजपा ने उसका जवाब देकर सीधे तौर पर साम्प्रदायिक होने से खुद को बचाया। आगे भी शायद माहौल को साम्प्रदायिक बनाने का जिम्मा ओवैसी को दिया जाएगा जिससे की भाजपा पर साम्प्रदायिक पार्टी होने का तंज बच जाएगा। इसका नमूना हैदराबाद में देखने को मिल चूका है। भाजपा ने पूरा चुनाव केवल उसी मुद्दे पर लड़ा जिसको ओवैसी ने हवा दी। ओवैसी और भाजपा ने मिलकर साम्प्रदायिक वोट को एकीकृत किया। तो जंहा भाजपा का वोट बैंक नगण्य था वंहा वो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वंही ओवैसी को भी फयदा हुआ और सारा नुक्सान हुआ टीआरएस को। खैर जो हो। जरुरत है लोगो को समझने की अब भाजपा को हिन्दू खतरे में हैं फ़ैलाने की जरुरत नहीं। वो काम मुस्लिम सशक्तिकरण के नाम पर ओवैसी करेंगे और भाजपा अपने को एक सर्वजन हिताये प्रेषित करेगी। क्यूंकि बीते कई चुनावो में भाजपा का विपक्षी दल चुनाव का मुद्दा स्थापित करने में सफल रहा है। और लोग विकास के मुद्दे पर आज भी भाजपा का साथ छोड़ दे रहें हैं। जंहा दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल ने चुनावी मुद्दा स्थापित कर भाजपा को करारी हार दी वंही बिहार में भी पूरी तरह टूट चुकी आर जे डी विकास के मुद्दे पर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। तो भाजपा के लिए विकास के मुद्दे पर प्रचार करना एक जरुरत है। पर वंही दिल्ली मॉडल के साथ जय हनुमान करने वाली पार्टियों का डर भी है। तो आगे भी शायद ओवैसी मुद्दों से भटकाने का काम करेगा। सतर्क रहिये सावधान रहिये क्यूंकि AIMIM भाजपा की बी टीम कम आरएसएस की मुस्लिम शाखा ज्यादा है। या यूँ कहे की AIMIM आजादी के बाद का मुस्लिम लीग है जिसका आज की हिन्दू महासभा यानी की आरएसएस के साथ चोली दामन का साथ है। पहले दोनों ने मिलकर देश का मानचित्र बाँट दिया था आज देश की जनता को बांटने का काम कर रहे हैं।

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