बिहार के विकास की कहानी: 2005 से अब तक

जी हां, बिहार का पुनर्रचना ही हुआ है एक तरह से 2005 के बाद। यकीनन 2005 के पूर्व की राजनीति का आधार और मूल्यांकन दोनों में सामाजिक न्याय को बल मिलते हुए दिख रहा है। सदियों सब चली आ रही सामाजिक व्यवस्था में सामाजिक न्याय शून्य भर था जिसको 1990 से जो राजनीतिक उलट फेर बिहार में हुए उसमें सामाजिक न्याय को अभूतपूर्व बल मिला।

जब नई सत्ता का आगाज़ हुआ तब बिहार की जनता ने दशकों से निराशा के भाव से तंग, एक नई आशा एवं उम्मीद के साथ नई सत्ता को एक परिपक्व नेतृत्व को एक नया बिहार बनाने की ज़िम्मेदारी सौंप दिया। आज भी जब हमलोग 2005 के पूर्व की स्थिति को याद करते हैं तो रूह कांप उठता है। बहुत बड़ी चुनौती थी नए नेतृत्व के सामने एक defunct State को Functional State में बदलना। कुछ आंकड़ों के सहारे समझने का प्रयास करते हैं। एक जाने माने अर्थशास्त्री श्री अरविंद विरमानी  के एक लेख ( Bihar’s Growth : Learning From Experience) के अनुसार 1993-94 से 2004-05 तक बिहार का औसत वृद्धि दर 5.3 प्रतिशत था जो बढ़कर 2004-05 से 2011-12 तक 11.7 प्रतिशत हो गया। बिहार का यह वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत वृद्धि दर से भी अधिक होना कोई साधारण बात नहीं है। राज्य का साक्षरता दर 47 प्रतिशत से 64 प्रतिशत तक पहुंचना, स्वास्थ्य सेवा के तमाम सूचांक में आशातीत वृद्धि कोई साधारण बात नहीं थी। इसके अलावा, राज्य में सुशासन, कानून व्यवस्था कायम करना, शिक्षा, स्वास्थ्य, निर्माण कार्य, सेवा क्षेत्र आदि में त्वरित सुधार कायम करना एक सपने जैसा लग रहा था। मुझे याद है जब मैं 2006 में एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (ADRI) के साथ कार्यरत था, तो विभिन्न जिलों में जाने का अवसर मिलता था। यात्रा के दौरान जब सड़कों पर गिट्टी, रोड़ा आदि का ढेर गिरा हुआ देखता था तो मन में एक अलग किस्म की अनुभूति होने लगती थी। उस अनुभूति में एक उम्मीद होती थी, बदलाव का अंदेशा नज़र आता था, नए नेतृत्व पर असीम भरोसा जागने लगता था। जब राह चलते किसी वर्षों से जीर्ण अवस्था में किसी पुल के नीचे डायवर्सन देखता और एक आध पुलनिर्माण संबंधित कोई उपकरण या गाड़ियां दिख जाती थी तो एक बदलते बिहार के कई रूप नज़र आने लगता था। ऐसी सैंकड़ों अनुभूतियों के बीच हमने बिहार को बदलते देखा है। राष्ट्रीय राजमार्ग 57 के आलावा अन्य राज्य राजमार्ग एवं सैंकड़ों पहुंच पथ का निर्माण कार्य का प्रारंभ होना आदि एक अलग ही रोमांच पैदा कर रहा था। जब मेरे गांव के खेतों में बिजली का खंभा गिरने लगा तो लगता था कि शायद अब हमलोग को भी डिबिया और लालटेन की रोशनी से जल्द निजात मिल जायेगा और हमारे घर, आंगन, खेत खलिहान आदि में बिजली की रोशनी जल्द ही आ जायेगी।

कई ऐसे ठोस कदम उठाए गए जिनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं  : वित्तीय प्रबंधन को

मजबूत करने की दिशा में वित्तीय घाटे को कम करने के लिए FRBM Act 2006 को लागू करना, Capital expenditure and Revenue Expenditure को एक निश्चित लक्ष्य के साथ बढ़ाना, प्रशासनिक सुधार आयोग के सिफारिशों को लागू करना, गांव गांव तक बिजली पहुंचाने की योजना एवं क्रियान्वयन, शिक्षकों की बहाली जो सरकारी विद्यालयों में शिक्षक एवं विद्यार्थी का अनुपात को कम करना अनिवार्य था, सड़कों का जाल बिछाना, पुल – पुलिया का निर्माण, कानून व्यवस्था एवं सुशासन कायम करना, जनता दरबार लगाना, विभिन्न प्रकार की योजनाओं का अंकेक्षण एवं क्रियान्वयन सुनिश्चित कराना, एनआरएचएम के सहयोग से संस्थागत प्रसव पर जोर देना, टीकाकरण पर जोर देना, शिक्षा में विभिन्न योजनाओं जैसे छात्रवृति योजना, साइकिल योजना, पोशाक योजना, स्कूल भवनों का निर्माण आदि कई ऐसे कदम उठाए गए। पंचायतों को सशक्त करना एवं स्थानीय इकायों को मजबूत करना, महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण के साथ पंचायती राज व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी के साथ महिलाओं के विकास पर जोर देना, सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण आदि के पहल से नए समाज का निर्माण करना बहुत ही सराहनीय कदम है।

ये सब साहस भरे कदम कोई अपरिपक्व नेतृत्व नहीं उठा सकते। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि बीते 15 साल में बिहार को जो एक कुशल, परिपक्व एवं दूरदृष्टि वाले नेतृत्व मिला, हम सभी बिहार वासियों के लिए सौभाग्य ही है। कोई शक नहीं कि उनके नेतृत्व में अन्य सहयोगी पार्टियां, अफ़सर, कार्यकर्ता एवं जनता का सकारात्मक सहयोग सराहनीय है।

बिहार के इस बदलाव की कहानी लिखने और इसको धरातल पर उतारने में विभिन्न प्रकार के अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, स्थानीय संस्था एवं राष्ट्रीय संस्थाओं का काफ़ी योगदान रहा है। विकास की गाड़ी आगे बढ़ हो रही थी की 2008 में कुसहा बांध टूटने और उत्तरी बिहार के सैकड़ों गांवों का बाढ़ में डूब जाना एक भयानक त्रासदी से काम नहीं था। मैं भी तकरीबन 10 दिनों तक सुपौल, मधेपुरा, सहरसा के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्य में लगा हुआ था। उस दौरान कई संस्थाओं से मुखातिब हुए और मैं अभी भी दिल से उन तमाम संस्थाओं को सलाम करता हूं जिन्होंने लाखों लोगों की मदद पहुंचाया।

ऐसे कई चुनौतियां आई और बिहार आगे बढ़ता रहा और बढ़ता जायेगा।

चूंकि मैं अपनी पढ़ाई पूरा करने के बाद से 2006 से बिहार में लगातार रह रहा हूं और विकास के विभिन्न चरणों को देख रहा हूं, इसीलिए मैं एक संक्षिप्त लेख लिखने का प्रयास किया हूं। मैंने सिर्फ प्रक्रिया और सक्षम नेतृत्व पर जोर दिया है।

Binod Kumar

बिनोद कुमार एक अंतराष्ट्रीय संस्था में कार्यरत हैं। उनकी शिक्षा दिल्ली विश्व विद्यालय के रामजस कॉलेज से हुई है। श्री कुमार जी ने लोक प्रशासन में स्नाकोत्तर एवं पब्लिक हेल्थ प्रबंधन में भी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हैल्थ से अपनी पढाई की है। पिछले 15 सालों से वे विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से जुड़कर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों तक पहुंच बनकर उनकी सेवा दे रहे हैं।